बिहार में मजबूर क्यों नज़र आ रही है भारतीय जनता पार्टी: नज़रिया
आगामी लोकसभा चुनाव के लिए बिहार से सीटों के बँटवारे में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की जो तस्वीर उभरी है, उसमें भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) मज़बूत नहीं, मजबूर नज़र आती है.
बीजेपी ने यहाँ के दोनों सहयोगी दलों - जनता दल युनाइटेड (जेडीयू) और लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) को अपने साथ बनाए रखने की ख़ातिर अप्रत्याशित समझौते किये हैं.
चूँकि नीतीश कुमार जेडीयू के लिए सत्रह सीटों पर और रामविलास पासवान एलजेपी के लिए छह सीटों पर दावेदारी झटकने में कामयाब हो गए, इसलिए बीजेपी को अपनी जीती हुई पाँच सीटों पर दावा छोड़ना पड़ा.
याद रहे कि गत चुनाव में बिहार से लोकसभा की कुल चालीस सीटों में से मात्र दो पर जेडीयू, सात पर एलजेपी और बाइस पर बीजेपी को जीत मिली थी.
ऐसे में बाइस की जगह सत्रह सीटों पर चुनाव लड़ने की विवशता में फँसी बीजेपी का कमज़ोर दिखना स्वाभाविक है.
साथ ही सीटों के बँटवारे को लेकर एनडीए के घटक दलों के बीच हुई खींचतान में एक सहयोगी उपेंद्र कुशवाहा का गठबंधन से अलग हो जाना भी बीजेपी को झटका दे गया.
इसी बीच रामविलास पासवान के पुत्र चिराग़ पासवान भी बीजेपी नेतृत्व को बाग़ी तेवर दिखाने लगे, ताकि लोकसभा की छह सीटों पर उनकी दावेदारी और रामविलास पासवान के लिए राज्यसभा की सीट सुनिश्चित हो जाए.
यही हुआ भी. राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के उपेंद्र कुशवाहा का दबाव तो काम नहीं कर सका, लेकिन रामविलास पासवान के दलित वोट वाले दबाव ने असर दिखा दिया.
ऐसा इसलिए भी संभव हुआ, क्योंकि उपेंद्र कुशवाहा के प्रति गरम रहने वाले नीतीश कुमार रामविलास पासवान के लिए नरम रहे.
दूसरी तरफ़ बीजेपी क़तई नहीं चाहती थी कि उसके प्रति दलितों के समर्थन की गुंजाइश घट जाने जैसी स्थिति उत्पन्न हो.
हालाँकि बिहार में उभरती चुनौती से एलजेपी आशंकित ज़रूर है, लेकिन बीजेपी-जेडीयू से अलग हो कर आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन में मनोनुकूल जगह बना लेने जैसी कोई स्पष्ट संभावना भी उसे नहीं दिख रही होगी.
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लगता है इसबार सियासी 'मौसम विज्ञानी' रामविलास दुविधा में फँस गये, क्योंकि हार जैसी मुसीबत की घड़ी में कम-से-कम राज्यसभा की एक सीट पर उन्हें बिठाने की गारंटी तो बीजेपी दे ही रही है.
यहाँ भी बीजेपी की विवशता इतनी बढ़ी हुई थी कि उसे केंद्र सरकार के प्रति चिराग़ पासवान की सख़्त बयानबाज़ी बर्दाश्त करनी पड़ी.
एलजेपी नेताओं ने यहाँ तक कह दिया कि केंद्र की तरफ़ से युवाओं और किसानों के हित में कारगर क़दम नहीं उठाये जा रहे.
बीजेपी ने यहाँ के दोनों सहयोगी दलों - जनता दल युनाइटेड (जेडीयू) और लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) को अपने साथ बनाए रखने की ख़ातिर अप्रत्याशित समझौते किये हैं.
चूँकि नीतीश कुमार जेडीयू के लिए सत्रह सीटों पर और रामविलास पासवान एलजेपी के लिए छह सीटों पर दावेदारी झटकने में कामयाब हो गए, इसलिए बीजेपी को अपनी जीती हुई पाँच सीटों पर दावा छोड़ना पड़ा.
याद रहे कि गत चुनाव में बिहार से लोकसभा की कुल चालीस सीटों में से मात्र दो पर जेडीयू, सात पर एलजेपी और बाइस पर बीजेपी को जीत मिली थी.
ऐसे में बाइस की जगह सत्रह सीटों पर चुनाव लड़ने की विवशता में फँसी बीजेपी का कमज़ोर दिखना स्वाभाविक है.
साथ ही सीटों के बँटवारे को लेकर एनडीए के घटक दलों के बीच हुई खींचतान में एक सहयोगी उपेंद्र कुशवाहा का गठबंधन से अलग हो जाना भी बीजेपी को झटका दे गया.
इसी बीच रामविलास पासवान के पुत्र चिराग़ पासवान भी बीजेपी नेतृत्व को बाग़ी तेवर दिखाने लगे, ताकि लोकसभा की छह सीटों पर उनकी दावेदारी और रामविलास पासवान के लिए राज्यसभा की सीट सुनिश्चित हो जाए.
यही हुआ भी. राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के उपेंद्र कुशवाहा का दबाव तो काम नहीं कर सका, लेकिन रामविलास पासवान के दलित वोट वाले दबाव ने असर दिखा दिया.
ऐसा इसलिए भी संभव हुआ, क्योंकि उपेंद्र कुशवाहा के प्रति गरम रहने वाले नीतीश कुमार रामविलास पासवान के लिए नरम रहे.
दूसरी तरफ़ बीजेपी क़तई नहीं चाहती थी कि उसके प्रति दलितों के समर्थन की गुंजाइश घट जाने जैसी स्थिति उत्पन्न हो.
हालाँकि बिहार में उभरती चुनौती से एलजेपी आशंकित ज़रूर है, लेकिन बीजेपी-जेडीयू से अलग हो कर आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन में मनोनुकूल जगह बना लेने जैसी कोई स्पष्ट संभावना भी उसे नहीं दिख रही होगी.
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लगता है इसबार सियासी 'मौसम विज्ञानी' रामविलास दुविधा में फँस गये, क्योंकि हार जैसी मुसीबत की घड़ी में कम-से-कम राज्यसभा की एक सीट पर उन्हें बिठाने की गारंटी तो बीजेपी दे ही रही है.
यहाँ भी बीजेपी की विवशता इतनी बढ़ी हुई थी कि उसे केंद्र सरकार के प्रति चिराग़ पासवान की सख़्त बयानबाज़ी बर्दाश्त करनी पड़ी.
एलजेपी नेताओं ने यहाँ तक कह दिया कि केंद्र की तरफ़ से युवाओं और किसानों के हित में कारगर क़दम नहीं उठाये जा रहे.
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